बुधनी टाईम्स sjp
इंदौर। शिव और उनके मंदिरों के बारे में कई किस्से इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन शाजापुर स्थित सुसनेर से 10 किमी दूर पहाड़ी पर स्थित पंचदेहरिया महादेव मंदिर का इतिहास बहुत ही अद्भुत है। पांडवों द्वारा निर्मित यह मंदिर लाल रंग के एक ही पत्थर से बना हुआ है और इसी पत्थर को काटकर शिवलिंग का निर्माण किया गया था। सावन मास पर बता रहा है इस मंदिर से जुड़ा इतिहास
ऐसीहै पंचदेहरिया महादेव की कहानी...- ऐसी मान्यता है कि जुएं में सबकुछ हारने के बाद वनवास पर गए पांडवों ने अपना अज्ञातवास यहां पर काटा था। यहां शिव की साधना के लिए भीम ने एक लाल पत्थर को काटकर एक मंदिर और उसी शिला से एक शिवलिंग का निर्माण किया था। पांडवों ने इस मंदिर को पंचदेहरिया महादेव का नाम देते हुए यहां शिव की आराधना की थी। इसी कारण आज भी इस मंदिर को पांडवकालीन पंचदेहरिया महादेव मंदिर कहा जाता है।
- मंदिर के पास ही पांडवों ने रहने के लिए कुछ गुफाएं भी बनाई थी। समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था के अनुरूप मंदिर को नए स्वरूप में बदला गया है। वर्तमान में मंदिर के बाहरी हिस्से पर सीमेंट का प्लास्टर हो रहा है, किंतु अंदर से देखने पर गर्भगृह व आसपास छोटी-छोटी गुफाएं एक ही पत्थर पर बनी हुई दिखाई देती है। यहां पर पांच पांडवों की कुटिया आज भी मौजूद है। भीम की एक अलग ही कुटिया बनी हुई है।
एक ही पत्थर से बना है मंदिर और शिवलिंग
- ज्योतिषाचार्य पं. बालाराम व्यास के अनुसार वे बचपन से ही इस मंदिर में पंडित हैं और शिव उपासना करते आ रहे हैं। उनके पूर्वजों ने भी इस मंदिर में आराधना की है। वे बताते थे कि यह मंदिर एक विशाल लाल रंग के पत्थर के अंदर बना हुआ है, मंदिर के ऊपर का शिखर भी पत्थर से बना हुआ है। पांडवों ने अपने बल पर एक पत्थर के अंदर इस मंदिर का निर्माण किया था। जिस शिला से मंदिर बना है उसी से कटकर शिवलिंग का निर्माण भी हुआ है। बाद में इसमें जलधारी और पीतल से कुछ अन्य काम हुआ है। इस मंदिर का उल्लेख शिवपुराण में भी मिलता है।
- ज्योतिषाचार्य पं. बालाराम व्यास के अनुसार वे बचपन से ही इस मंदिर में पंडित हैं और शिव उपासना करते आ रहे हैं। उनके पूर्वजों ने भी इस मंदिर में आराधना की है। वे बताते थे कि यह मंदिर एक विशाल लाल रंग के पत्थर के अंदर बना हुआ है, मंदिर के ऊपर का शिखर भी पत्थर से बना हुआ है। पांडवों ने अपने बल पर एक पत्थर के अंदर इस मंदिर का निर्माण किया था। जिस शिला से मंदिर बना है उसी से कटकर शिवलिंग का निर्माण भी हुआ है। बाद में इसमें जलधारी और पीतल से कुछ अन्य काम हुआ है। इस मंदिर का उल्लेख शिवपुराण में भी मिलता है।
औरंगजेब ने किया था वार, बन गया शिव का तीसरा नेत्र- पंडित व्यास के अनुसार उनके पूर्वजों ने बताया था कि भारत पर आक्रमण कर कई मंदिरों को क्षतिग्रस्त करने वाले औरंगजेब ने भी यहां आक्रमण किया था। जिससे शिवलिंग खंडित हो गया था। औरंगजेब के शिवलिंग पर सीधे वार से शिवलिंग में तीसरे नेत्र जैसी आकृति उभर आई।
- उसके कई साल बाद बड़े- बड़े नगरों के कलाकारों ने इस खंडित हिस्से को जोड़ने का प्रयास किया। कलाकार इसको जोड़कर भी गए, किंतु कुछ समय बाद ही वह जुड़ा हुआ हिस्सा वापस टूटकर नीचे गिर जाता था। उन्होंने कई प्रकार के केमिकल लगाकर उस पत्थर को जोड़ा और दावा किया कि अब ये पत्थर कभी नहीं निकलेगा।
- आश्चर्य की बात ये है कि उनके मंदिर से बाहर निकलते ही ये पत्थर नीचे गिर गया। ऐसा एक बार नहीं करीब 20 बार हुआ। बाद में श्रद्धालुओं ने इस हिस्से को शिवजी का तीसरा नेत्र मानकर खाली छोड़ दिया। तब से आज जक शिवलिंग पर इस हमले का निशान मौजूद है।संतों ने साधना कर बताया इस जगह का महत्व
- वर्तमान में यहां 35 गांव के लोग जुड़े हैं। बड़ी बात ये है कि यहां आपराधिक प्रवृत्ति बहुत कम हो गया है। पंडित बालाराम व्यास जी ने कहा कि मैं 20 वर्षाें से स्वयं बाबा की सेवा कर रहा हूं। मैं यहां महामृत्युंजय का जाप और अनुष्ठान कर रहा हूं। चित्रकूट से छह साल पहले शिवराम बाबा और दयानंद जी महाराज जी आए थे। वे जब यहां साधना करने बैठे तो कुछ देर बात ही ध्यान से उठकर कहा कि पंडित जी यहां पर हमें बहुत अच्छा टॉवर मिल रहा है। साधना का नेटवर्क बहुत अच्छा है। इसके बाद उन्होंने यहां बाबा महंत पंचदेही आश्रम का निर्माण किया।
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